छत्तीसगढ़ में ‘सुपर CM’ की परंपरा: 25 साल बाद भी सत्ता के पीछे अदृश्य सत्ता का खेल जारी, अब कौन हैं सुपर CM ?

छत्तीसगढ़ में ‘सुपर CM’ की परंपरा: 25 साल बाद भी सत्ता के पीछे अदृश्य सत्ता का खेल जारी, अब कौन हैं सुपर CM

रायपुर – छत्तीसगढ़ बने 25 साल हो गए, सरकारें बदलीं, मुख्यमंत्री बदले, नारे बदले, लेकिन एक चीज़ नहीं बदली—‘सुपर CM’ की परंपरा। सत्ता का चेहरा सामने होता है, लेकिन फैसले कहीं और से होते हैं—यह आरोप, यह चर्चा, यह सियासी सच्चाई हर दौर में प्रदेश ने देखी है। आज फिर वही सवाल गूंज रहा है—क्या छत्तीसगढ़ में परदे के पीछे का मुख्यमंत्री कोई और है? क्या सरकार उसी के इर्द गिर्द चल रही है?

जड़ें मध्यप्रदेश से, परछाईं आज तक

छत्तीसगढ़ के गठन से पहले, जब यह मध्यप्रदेश का हिस्सा था, तब कांग्रेस की सरकार और मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह थे। उसी दौर में सत्यनारायण शर्मा को ‘सुपर CM’ कहा जाता था। हालात ऐसे बताए जाते थे कि बिना उनकी मर्जी के सत्ता की गाड़ी हिलती तक नहीं थी। यहीं से छत्तीसगढ़ की राजनीति में ‘अदृश्य सत्ता’ की नींव पड़ी।

2000–2003: अजीत जोगी सरकार और सुपर पावर सेंटर

2000 में छत्तीसगढ़ बना, पहले मुख्यमंत्री बने अजीत जोगी। लेकिन सत्ता के गलियारों में चर्चा मुख्यमंत्री से ज्यादा आर.पी. मंडल और अमित जोगी की थी। आरोप लगे कि प्रशासनिक फैसले, राजनीतिक नियुक्तियां—सब पर ‘सुपर CM’ की छाप थी।

2003–2018: भाजपा के 15 साल और ‘अमन राज’

2003 में भाजपा सत्ता में आई और डॉ. रमन सिंह 15 साल तक मुख्यमंत्री रहे। लेकिन इन 15 सालों में सत्ता के असली केंद्र के तौर पर अमन का नाम बार-बार उछला। कहा गया कि ट्रांसफर, पोस्टिंग, टेंडर और बड़े फैसलों में उनकी भूमिका निर्णायक थी। यानी सरकार भाजपा की थी, लेकिन ‘सुपर CM’ का सिस्टम जस का तस।

2018–2023: कांग्रेस लौटी, सुपर CM और मजबूत

2018 में कांग्रेस भारी बहुमत से सत्ता में आई। भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने। जनता ने बदलाव के नाम पर वोट दिया, लेकिन सत्ता के पीछे का खेल नहीं बदला। इस दौर में सौम्य का नाम ‘सुपर CM’ के तौर पर चर्चा में रहा। आरोप यहां तक लगे कि IAS अफसरों को उनसे मिलने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता था। यानी चुनी हुई सरकार, लेकिन प्रशासन पर पकड़ किसी और की।

2023: सुशासन का वादा, उम्मीदें जगीं

2023 में भाजपा फिर सत्ता में लौटी। आदिवासी चेहरे के तौर पर विष्णु देव साय मुख्यमंत्री बने। ‘मोदी की गारंटी’ और ‘सुशासन’ के नारों से उम्मीद जगी कि शायद अब सुपर CM की परंपरा खत्म होगी। शुरुआत में मुख्यमंत्री की पत्नी कौशल्या देवी को लेकर कानाफूसी हुई, लेकिन उनके स्पष्ट बयान—“मैं सुपर CM नहीं हूं”—के बाद लोगों ने राहत की सांस ली।

फिर वही कहानी: चर्चा चार की, पर ‘राहु’ और ‘रवि’ का नाम

लेकिन राहत ज्यादा दिन नहीं टिकी। अब फिर राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा आग की तरह फैल रही है। आप ने अक्सर सुना होगा राहु केतु के बारे मे.. लेकिन यह मामला राहु और रवि में फॅसा हुआ है। कहा जा रहा है कि सत्ता के असली सूत्रधार चार में अब ‘राहु’ और ‘रवि’ हैं।

आरोप बेहद गंभीर हैं—ट्रांसफर–पोस्टिंग बिना उनकी मंजूरी के नहीं, विकास योजनाएं उन्हीं के इशारों पर,
MOU, प्रोजेक्ट, बड़े सौदे—सब पर कथित पकड़।

यानी मुख्यमंत्री सामने, लेकिन फाइलें किसी और के दरवाज़े से होकर गुजर रही हैं।

सबसे बड़ा सवाल: लोकतंत्र या ‘रिमोट कंट्रोल’ सरकार?

25 साल में छत्तीसगढ़ ने एक बात बार-बार देखी मुख्यमंत्री बदलते हैं, लेकिन ‘सुपर CM’ नहीं। आज सवाल यह नहीं कि सुपर CM है या नहीं, सवाल यह है कि— अगर सरकार चुनी हुई है, तो फैसले गिने-चुने लोग क्यों कर रहे हैं?

अगर सुशासन है, तो पर्दे के पीछे नाम क्यों गूंज रहे हैं?

जब तक इन सवालों के साफ जवाब नहीं मिलते, तब तक छत्तीसगढ़ की राजनीति पर एक ही आरोप चस्पां रहेगा— यहां सत्ता दिखती किसी और की है, चलती किसी और की।

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