नई दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क (Excise Duty) में की गई भारी कटौती से सरकारी खजाने को बड़ा झटका लगने वाला है। अनुमान है कि वित्तीय वर्ष 2026-27 तक सरकार को इससे 1.7 लाख करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान होगा। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस घाटे की भरपाई के लिए सरकार जिस रास्ते को अपना रही है, उसका सीधा असर आने वाले समय में आम जनता पर पड़ेगा।
राजस्व घाटा और कर्ज का बढ़ता बोझ
पिछले वर्ष सरकार ने आयकर और जीएसटी दरों में कटौती की थी, जिससे पहले ही राजस्व में कमी आई थी। अब पेट्रोलियम पर उत्पाद शुल्क में कटौती से खजाना और खाली होगा। इस कमी को पूरा करने के लिए सरकार ‘बाजार से अधिक कर्ज’ (Market Borrowing) लेने की रणनीति पर चल रही है।
2026-27 के केंद्रीय बजट में 16.09 लाख करोड़ रुपये का ऋण लेने का प्रावधान रखा गया था। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि वित्त वर्ष की पहली छमाही में ही इसका 51 फीसदी यानी 8.2 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लिया जा चुका है। जानकारों का अनुमान है कि दूसरी छमाही में भी सरकार इसी गति से कर्ज लेगी, जिससे बजट में तय ऋण की सीमा का टूटना तय है।
बढ़ती ब्याज दरें और दीर्घकालिक दबाव
सरकार जब बाजार से अधिक कर्ज लेती है, तो उसके बॉन्ड पर ब्याज दरें भी बढ़ जाती हैं। वर्तमान में भारत सरकार के 10-वर्षीय बॉन्ड की ब्याज दर 6.92 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो काफी चिंताजनक है। इसका सीधा अर्थ यह है कि सरकार को अपने पुराने और नए कर्जों पर ब्याज के रूप में भारी रकम चुकानी होगी। इससे भविष्य के बजट में कर्ज और ब्याज अदायगी का दबाव बढ़ता जाएगा।
विकास कार्यों पर पड़ सकती है मार
यदि सरकार की आमदनी के स्रोत नहीं बढ़ते हैं, तो इस बढ़ते कर्ज और ब्याज के बोझ को संभालने के लिए सरकार को विकास और जन-कल्याणकारी योजनाओं के बजट में कटौती करनी पड़ सकती है।
विश्लेषकों का कहना है कि वर्तमान में सरकार के पास राजस्व जुटाने के विकल्प सीमित हैं:
परोक्ष कर (Indirect Taxes): इनकी सीमा पहले ही समाप्त हो चुकी है, क्योंकि आम जनता पर और कर बढ़ाना कठिन है।
विनिवेश (Disinvestment): सरकारी कंपनियों को बेचकर पैसा जुटाने की गुंजाइश भी अब काफी कम हो गई है।
अमीरों पर कर: एक विकल्प धनी वर्ग और कॉरपोरेट्स पर कर बढ़ाना है, लेकिन वर्तमान में सरकार की प्राथमिकता कॉरपोरेट मुनाफे को बढ़ावा देने की है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होने के दौर में कंपनियों को राहत देने के लिए किया गया यह निर्णय सीधे तौर पर सरकारी तिजोरी पर भारी पड़ रहा है। गणित स्पष्ट है—आज की इस ‘राहत’ का बोझ कल सरकार कर्ज के रास्ते जनता पर ही डालेगी। यदि समय रहते आय के वैकल्पिक स्रोत नहीं तलाशे गए, तो आने वाले समय में विकास कार्यों का पहिया धीमा हो सकता है और आम जनता को महंगाई व कम सरकारी सुविधाओं के रूप में इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।






