बच्चों की चीखों तक पहुंची पुलिस, 8 तस्कर से छुड़ाए गए 13 मासूम

कबीरधाम। सुबह का अंधेरा अभी पूरी तरह छंटा भी नहीं था, तभी कबीरधाम पुलिस की गाडिय़ां जंगलों और गांवों की पगडंडियों पर धूल उड़ाती दौड़ रही थीं। कहीं मवेशियों के बीच दुबके बच्चे थे, कहीं सूनी बाड़ों में कैद बचपन और कहीं मासूम आंखों में ऐसा डर, जैसे कई महीनों से सूरज भी उन्हें आजाद नहीं दिखा हो। मामला कोई साधारण बाल श्रम का नहीं था, बल्कि बैगा जनजाति के नाबालिग बच्चों को पैसों के लालच में खरीदकर बंधुआ मजदूरी कराने के उस काले खेल का था, जिसने पूरे इलाके को झकझोर दिया। पुलिस अधीक्षक धर्मेंद्र सिंह को खबर मिली कि ग्राम थूहापानी और आसपास के इलाकों से 15 से 20 बच्चों को बहला-फुसलाकर ले जाया गया है और उनसे जबरन काम कराया जा रहा है। सूचना मिलते ही जिले में जैसे ऑपरेशन शुरू हो गया। अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पुष्पेंद्र बघेल और अमित पटेल के मार्गदर्शन में पुलिस टीमों ने भलपहरी, खरहट्टा पाण्डातराई, सारंगपुर कला, कान्हाभैरा और दशरंगपुर में एक साथ दबिश दी और फिर जो सामने आया उसने हर किसी को सन्न कर दिया। 8 से 15 साल तक के 13 मासूम बच्चे गाय-बैल चराने, मवेशियों की देखभाल और लगातार कठिन काम करने को मजबूर मिले। बच्चों ने कांपती आवाज में बताया कि सुबह 6 बजे से रात तक उनसे काम कराया जाता था, लेकिन बदले में उन्हें एक रुपया तक नहीं मिलता था। उनके माता-पिता को सिर्फ 1000 से 2000 रुपये देकर बच्चों का बचपन गिरवी रख लिया गया था। जैसे-जैसे पूछताछ आगे बढ़ी, कहानी और खौफनाक होती गई। खुलासा हुआ कि करीब 6-7 महीने पहले आरोपी रवि यादव पिता गोपाल यादव उम्र 38 वर्ष निवासी ग्राम थूहापानी और उसके साथियों ने गरीब परिवारों को पैसों का लालच देकर बच्चों को अपने कब्जे में लिया था। पुलिस ने एक-एक कर पूरे गिरोह को दबोच लिया। गिरफ्तार आरोपियों में रामू यादव पिता इतवारी यादव उम्र 53 वर्ष निवासी ग्राम भलपहरी, धनीराम यादव पिता ज्ञान यादव उम्र 55 वर्ष निवासी ग्राम कान्हाभेरा, सर्वन यादव पिता कपिल यादव उम्र 45 वर्ष निवासी ग्राम कान्हाभेरा, दीपक यादव पिता राम जी यादव उम्र 25 वर्ष निवासी ग्राम कान्हाभेरा, रामफल यादव निवासी ग्राम सारंगपुर, राम बिहारी यादव और रुपेश यादव शामिल हैं। थाना भोरमदेव में अपराध क्रमांक 29/2026 दर्ज करते हुए पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की गंभीर धाराओं के साथ जेजे एक्ट, बाल एवं किशोर श्रम अधिनियम और बंधुआ मजदूर प्रणाली उन्मूलन अधिनियम के तहत केस कायम किया। रेस्क्यू के बाद सभी बच्चों को कोतवाली लाकर जिला बाल संरक्षण इकाई और चाइल्ड लाइन की मदद से सुरक्षित बालगृह भेजा गया, जहां उनकी काउंसलिंग और देखभाल की जा रही है। इस पूरे ऑपरेशन में निरीक्षक लालमन साव, निरीक्षक उमाशंकर राठौर, डीएसबी प्रभारी निरीक्षक नितिन तिवारी और उनकी टीम ने लगातार कई घंटों तक दबिश देकर बच्चों को सुरक्षित निकाला। पुलिस का कहना है कि यह सिर्फ एक कार्रवाई नहीं बल्कि बचपन को वापस जिंदगी देने की लड़ाई थी। अब आरोपी सलाखों के पीछे हैं और उन मासूमों की आंखों में पहली बार डर से ज्यादा उम्मीद दिखाई दे रही हैज् क्योंकि याद रखिए, जिस समाज में बच्चे स्कूल की जगह बाड़ों में कैद होने लगें, वहां सिर्फ कानून नहीं बल्कि इंसानियत भी खतरे में पड़ जाती है।

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