पांडा दुनिया के सबसे प्यारे और दुर्लभ जानवरों में गिने जाते हैं। चिड़ियाघरों में इनकी खास देखभाल की जाती है, लेकिन एक दिलचस्प बात यह है कि दुनिया के किसी भी देश में मौजूद पांडा पर मालिकाना हक चीन का ही होता है, चाहे उनका जन्म कहीं भी क्यों न हुआ हो। यह व्यवस्था चीन की खास “पांडा पॉलिसी” के तहत लागू होती है, जो केवल संरक्षण तक सीमित नहीं बल्कि उसकी वैश्विक कूटनीति और सॉफ्ट पावर का भी अहम हिस्सा है।
उपहार से लीज तक का सफर
1950 के दशक में चीन ने पांडा को अन्य देशों को दोस्ती के प्रतीक के रूप में उपहार देना शुरू किया था। लेकिन 1980 के दशक में पांडा को संकटग्रस्त प्रजाति घोषित किए जाने के बाद नियम बदल दिए गए। इसके बाद चीन ने पांडा को उपहार देने की जगह लीज (उधार) पर देना शुरू किया। यानी अब कोई भी देश पांडा को एक तय समय के लिए ही रख सकता है, और उस पर अंतिम अधिकार चीन का ही रहता है।
कैसे काम करती है पांडा पॉलिसी?
पूर्ण स्वामित्व- दुनिया में मौजूद हर विशालकाय पांडा को चीन अपनी संपत्ति मानता है।
संरक्षण पर जोर- विदेशों में भेजे गए पांडा रिसर्च और प्रजनन कार्यक्रमों का हिस्सा होते हैं।
भारी शुल्क- किसी भी देश को पांडा रखने के लिए हर साल लगभग 10 से 20 लाख डॉलर का भुगतान करना पड़ता है। यह पैसा पांडा संरक्षण में लगाया जाता है।
चीन की सॉफ्ट पावर का हथियार
पांडा पॉलिसी केवल संरक्षण का मामला नहीं है, बल्कि यह चीन की डिप्लोमैटिक स्ट्रेटेजी भी है। जब चीन किसी देश के साथ रिश्ते मजबूत करना चाहता है, तो पांडा “गुडविल गिफ्ट” की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं।
1972 में अमेरिका-चीन संबंधों में सुधार के दौरान पांडा भेजे गए थे। आज भी कई देशों के साथ व्यापार और कूटनीतिक रिश्ते मजबूत करने में यह नीति अहम भूमिका निभाती है।
आर्थिक फायदा भी
पांडा जिस भी चिड़ियाघर में होते हैं, वहां पर्यटकों की संख्या बढ़ जाती है। इससे उस देश को आर्थिक लाभ मिलता है और अप्रत्यक्ष रूप से चीन के साथ उसके संबंध भी मजबूत होते हैं।
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