SC से कुलदीप सिंह सेंगर को बड़ा झटका, दिल्ली HC का उम्रकैद की सजा निलंबित करने का आदेश रद्द

नई दिल्ली। उन्नाव रेप मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से करारा झटका लगा है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस विवादित फैसले को सिरे से रद्द कर दिया, जिसमें सेंगर की उम्रकैद की सजा को निलंबित कर दिया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने इस गंभीर मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस हाईकोर्ट के पास भेज दिया है। इससे पहले बीते 29 दिसंबर को भी सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के जमानत वाले आदेश पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी थी।
CBI की अपील मंजूर, 2 महीने में फैसला सुनाने का निर्देश
शीर्ष अदालत ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की अपील को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट को कड़े निर्देश दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सेंगर के कनविक्शन और उम्रकैद की सजा के खिलाफ दायर याचिका पर उच्च न्यायालय 2 महीने के भीतर अपना फैसला सुनाने की कोशिश करे। गौरतलब है कि पिछले साल दिसंबर में दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे सेंगर को जमानत पर रिहा करने और सजा निलंबित करने का हैरान करने वाला आदेश दिया था। इस फैसले के बाद पीड़िता ने भारी निराशा जताई थी और जनता में भी खासा आक्रोश देखने को मिला था, जिसके बाद न्याय के लिए सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
नाबालिग होने और ‘लोक सेवक’ की परिभाषा पर जोरदार बहस
सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान सेंगर की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील एन. हरिहरन ने दलील दी कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग नहीं थी। हालांकि, सीबीआई की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस दलील का कड़ा विरोध किया। उन्होंने अदालत में तर्क दिया कि हाईकोर्ट का यह मानना पूरी तरह गलत है कि कोई विधायक ‘पब्लिक सर्वेंट’ (लोक सेवक) नहीं होता। इस पर जस्टिस बागची ने भी सहमति जताते हुए स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट का यह जरूरत से ज्यादा तकनीकी दृष्टिकोण अपनाना बिल्कुल सही नहीं था। वहीं, सीजेआई ने भी हाईकोर्ट को इस अहम बिंदु पर फिर से गहराई से विचार करने को कहा है कि क्या ‘पॉक्सो एक्ट’ (POCSO Act) के तहत मुकदमा चलाने के लिए किसी विधायक को ‘लोक सेवक’ माना जा सकता है या नहीं।
क्या था दिल्ली हाईकोर्ट का वह विवादित फैसला?
दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 दिसंबर 2025 को सुनाए गए अपने फैसले में एक कानूनी पेंच का हवाला देते हुए यह राहत दी थी। हाईकोर्ट का कहना था कि सेंगर को पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) की धारा 5 (C) के तहत, यानी एक ‘लोक सेवक’ द्वारा यौन शोषण करने के मामले में दोषी ठहराया गया था। लेकिन, अदालत की नजर में एक चुना हुआ जनप्रतिनिधि या विधायक भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 21 के तहत परिभाषित “लोक सेवक” के दायरे में पूरी तरह फिट नहीं बैठता है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सजा निलंबित की थी, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है।

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